प्रतापगढ सत्य बोलना सबसे कठिन कार्य है। गोस्वामी तुलसी दास ने कहा है-'धरम न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना।।' धर्म की इससे सुंदर और संक्षिप्त परिभाषा संभव नहीं है।क्षेत्र के मोती सिंह इ० का० सरायभिखारी के प्रांगण में आयोजित संगीतमयी श्रीरामकथा साप्ताहिक ज्ञान यज्ञ कार्यक्रम में अयोध्या से पधारे मानस मर्मज्ञ पण्डित रामजी शरण महराज ( मांसवेत्ता)(अयोध्या धाम एवम चित्रकूट धाम) ने धर्म को परिभाषित किया। कहा कि एक तरफ गोस्वामी जी ने सत्य को धर्म बताया है तो वहीं 'परहित धरम सरिस नहीं भाई' कहकर धर्म के दूसरे सोपान की व्याख्या किया है। परोपकार के तीन रूपी तमोगुणी, रजोगुणी और सतोगुणी हैं पर गोस्वामी तुलसीदास ने त्रिगुणातीत परोपकार की बात कही है। उन्होंने प्रवचन के दौरान सौभाग्य एवं दुर्भाग्य को परिभाषित किया। कहा कि मानव जब प्रभु का सामीप्य प्राप्त करता है, सौभाग्य है और जब वह दूर होता जाता है तो दुर्भाग्य प्रारंभ हो जाता है। दूधाधारी मठ के महंत पं.राम सुंदर दास ने कहा कि हिंसा महज मारने या रक्त प्रवाहित करने को नहीं कहा जाता है। वाणी से, कर्म से और मन से भी हिंसा की जाती है। मानव को इन तीनों तरह की हिंसा से बचना चाहिए। उन्होने कहा कि परमात्मा के प्रसन्न होने से मनुष्य को संपत्ति मिलती है पर प्रभु जब विशेष प्रसन्न होते हैं तो मानव को सत्संग का अवसर मिलता है। जनता जिसे चुनती है वह विधानसभा या संसद पहुंचता है पर जब जर्नादन चुनते हैं तो व्यक्ति सत्संग में जाता है। कार्यक्रम की शुरूआत में कथावाचक ने श्रीराम जानकी का विधिवत पूजन कराया। इसमे कथा वाचक पण्डित रामजी शरण महराज ( मांसवेत्ता)(अयोध्या धाम एवम चित्रकूट धाम) आयोजक श्रीभरत शरण जी महराज ( बृंदावन धाम ) अध्यक्षता भारत सिंह ने किया अंत में आयोजक बब्लू सिंह ने सबका आभार व्यक्त किया संचालन संजय सिंह महमूदपुर ने किया । इस मौके पर जयनारायण उपाध्याय, जमुना प्रसाद शुक्ल, राम शिरोमणि प्रजापति, पत्रकार यादव, सोनेलाल यादव, संतोष सिंह, प्रदीप सिंह, राजू सिंह, हर्ष कुमार बरनवाल, राम बली पांडेय, आदि उपस्थित रहे ।
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