आज राजा हरपाल सिंह महाविद्यालय सिंगरामऊं जौनपुर के हिन्दी में महाप्राण निराला जी की जन्म जयंती मनायी गयी। डॉ रवीन्द्र कुमार सिंह ने महाप्राण सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कर्मस्थली डलमऊ और गंगा का वह तीर जहां उन्होंने 'चतुरी चमार' से लेकर 'कुल्ली भाट' तक अधिकाँश पात्रों का सृजन किया, विस्तार से चर्चा की।
हिंदी साहित्य जगत के दैदीप्यमान नक्षत्र महाप्राण निराला को तो सभी जानते हैं, पर इस अमर पुरोधा ने डलमऊ में ही हिन्दी सीखी और यहीं गंगा किनारे किले की बुर्ज पर बैठकर "बांधों न नांव इस ठांव बंधु, पूछेगा सारा गाँव बंधु " जैसी कालजयी रचनाओं के साथ काफी कुछ साहित्य सृजन किया। यही कारण है की निराला साहित्य में डलमऊ व आस-पास के इलाके के चतुरी चमार से लेकर कुल्ली भांट तक अधिकाँश पात्र विद्यमान रहे हैं। यही नहीं साहित्य में डलमऊ व आस-पास के इलाके की सामाजिक विसंगतियों, गरीबी आदि की स्पष्ट झलक मौजूद है। यह बात दीगर है की गंगा तीरे जिस बुर्ज पर बैठकर साहित्य सृजन करके महाप्राण ने हिन्दी साहित्य जगत को नयी रोशनी दिखाई वह पक्का घाट पूरी तरह उपेक्षित है, बदहाल है।
वर्ष 1911 में जब निराला नौवीं कक्षा में पढ़ते थे तो उनका विवाह डलमऊ निवासी पंडित रामदयाल की पुत्री मनोहरा देवी से हुआ। विवाह पश्चात जब पहली बार निराला डलमऊ आये तो मनोहरा देवी ने उन्हें "श्री राम चन्द्र कृपालु भजु मनु" सस्वर सुनाया। चूंकि निराला की शिक्षा-दीक्षा बांग्ला में हुई थी, लेकिन इन पंक्तियों को सुनने के बाद उनका स्वाभिमान जाग गया और उन्होंने हिन्दी पर पूर्ण अधिकार का संकल्प ले डाला। बगैर किसी व्यक्ति की सहायता के उन्होंने स्वयं हिन्दी सीखी और वांग्मय का गंभीर अध्ययन किया। पंडित पथवारी दीन उर्फ़ कुल्लीभांट डलमऊ के मूल निवासी थे।
निराला जब पहली बार आये तो रेलवे स्टेशन से ससुराल तक वे कुल्ली के ही ताँगे से आये। कुल्ली भांट इतिहासकार, समाज सुधारक व देशभक्त थे और कविता भी करते थे। इसीलिये दोनों में खूब छनी।प्रगतिशील कुल्ली ने सर्वहारा वर्ग के लिए एक पाठशाला भी खोली थी। कुल्ली की इन्हीं विशेषताओं से निराला जी इतने प्रभावित हुए की उन्होंने कुल्ली भांट पर एक पूरी पुस्तक ही लिख डाली।
डलमऊ किले का रहस्य व दर्शन कुल्ली ने ही उन्हें कराया। फिर तो किला ही निराला की साहित्य साधना का केंद्र बन गया। किले से सम्बंधित आख्यान के सहारे ही उन्होंने "प्रभावती " नामक उपन्यास की रचना की। डलमऊ किले के अतिरिक्त निराला की साहित्य साधना का दूसरा केंद्र संकट मोचन घाट था। इसी घाट पर दो बुर्ज बने हैं, जिस पर बैठ कर निराला गंगा दर्शन व काव्य सृजन करते थे। सन 1929 में निराला ने डलमऊ के समीप पखरौली गाँव के जमींदार द्वारा एक गरीब लड़की के साथ किये गए दुर्व्यवहार के प्रतिक्रया स्वरूप "अलका" उपन्यास की रचना की। उनका "सरोज स्मृती " काव्य भी डलमऊ की देन है। हिन्दी शोक काव्य में इसका सर्वोच्च स्थान है।सरोज निराला की एक मात्र पुत्री थी।
दहेज़ न दे पाने के कारण जब बैसवारा के कान्य - कुब्जों के यहाँ बिटिया की शादी न कर सके तो उन्होंने अपने प्रिय शिष्य शेखर त्रिवेदी (इसिया-बछरावां ) के साथ बिटिया का विवाह कर दिया।विवाह के एक वर्ष पश्चात ही क्षय रोग से पीड़ित होकर सरोज का निधन हो गया।अक्षमता,विवशता, और कराहती हुई असीम वेदना सरोज-स्मृति में दिखाई दी , जिसमें लिखा-
"धन्ये मैं पिता निरर्थक था,
तेरे हित कुछ न कर सका"
अपने एकाकी समय में घाट एवं प्रिय को इन शब्दों में उतारा -
"यह घाट वही है जिस पर हंसकर, वह कभी नहाती थी हंसकर, आँखे रह जाती थी फंसकर ,कांपते थे दोनों पाँव बंधु, बांधों न नांव इस ठांव बंधु , पूछेगा सारा गाँव बंधु ".
निराला जी की इस कर्म स्थली यानी "घाट का कर्ज " की क्या ऐसी विशेषता है जिसने निराला को चिर अमर बना दिया। डलमऊ स्थित इस पक्के घाट में पालनेदार सीढियां जैसे माता की गोद में झुलाने का सुख देती हैं।बगल में बने निचले बुर्ज के हिस्से में सात मेहराबदार खुले द्वार हैं।अन्दर शेषनाग के फन की चित्रकारी है।आठ गोल खंभों में शिव मंदिर जैसा आकार निर्मित है। निराला जी चिंतन -मनन करते भादों की विशाल जल धारा में इसी बुर्ज के हिस्से से छलांग लगाकर कूद जाते थे। अब वह संकटमोचन घाट उपेक्षित है और बुर्ज भी।
आज वसंत पंचमी है और आज ही महाप्राण निराला जी की जन्म जयंती है। अपनी संपूर्ण भावना के साथ महाप्राण को सादर प्रणाम नमन करता हूँ।

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