Blog

शुक्रवार, 24 जुलाई 2020

मुफलिस का कानून ..........अभय त्रिपाठी जौनपुर

अभय त्रिपाठी जौनपुर
सिरकोनी अगर संविधान के अनुरूप सभी भारतीय एकसमान हैं और कानून भी सभी के लिए एकसमान है , तो फिर सारे राजनियम भला क्यों झेले हमारे ये मुफलिस . अपराध जगत से हटकर अगर बात करे तो यही अवसान होता है कि सारे तौर तरिके नियम कानून बस इन लाचारों के लिए ही बने है , क्योंकि न तो इनके नेटवर्क तगड़े होते हैं और ना ही ये मुद्रा से सम्पूर्ण होते हैं.
फिर क्या है तमाम आपदा राहों में और सबका नतीजा फक़त फुस्स आता है.

वही रईसों की बात किया जाए तो उनके लिए कोई नियम कानून मायने नहीं रखता उनके नेटवर्क हर इलाकों में प्रबल है और जहा नहीं है वहा पैसा फेक तमाशा देख का उसूल लग जाता है , सत्ता किसी की भी हो पर झेलना तो सिर्फ इनको ही है.

शिक्षालय है या जुर्मानालय आरंभ करते हैं इल्म से, स्कूलों और कॉलेजों में जिस तत्परता से फीस वसूल की जाती है, शायद मालगुजारी भी उतनी सख्ती से नहीं वसूल की जाती।  या तो फीस दीजिए, या नाम कटवाइए,  फीस न दी तो नाम कट जाता है। गरीबों के लड़के स्कूल छोड़कर भाग जाएं शिक्षा के नाम पर मशहूर प्राइवेट स्कूल उनके नशिब में नहीं और प्राथमिक विद्यालयों की शिक्षा तो बेजोड़ है ही , तो अफसर और डाक्टर वही बने जो पैसों से भरपूर है इल्म के नाम पर इल्जाम है ये कानून व्यवस्था जो लाचारों से पैसे वसूलते आ रहे हैं. आखिर गरीब जाये तो कहा जाये लाखों रुपए देकर डाक्टरी पढने की तो हैसियत है नहीं तो फिर इल्म इनके लिए किसी इल्जाम से कम नहीं.


वही बात करते हैं लाइन में लगे लोगों के लम्बे कतारों की चाहे दर्शन हेतु मंदिरों को ले लिया जाए या फिर किसी कोर्ट कचहरी को ले लिया जाए , लाचारों के लिए लाइनें अनिवार्य है ओर रइसों के लिए सिर्फ तुच्छ तमाशा क्योंकि  पैसौ से कमाए हुए नाम तो इसी दिन के लिए काम आते है, और बेचारे मुफलिस तिलमिलाती हुई धूप में अपनी पारी के आने का इतेंजार करते हैं चाहे चार घंटे लगे या फिर दस घंटे कोई फर्क नहीं मुफलिस तो मुफलिस ही है न.


इतना ही नहीं, इस देश में कई बड़े और दिग्गज रइस ऐसे हैं, जो कई प्रकार के जुर्म करके खुलेआम घूम रहे हैं. फिर भी उन्हें कानून अपने शिकंजे में नहीं लेता, जबकि एक गरीब वैसे ही अपराध में सलाखों के पीछे नजर आता है. आखिर क्यों? क्या उनके लिए संविधान लागू नहीं होता.. ऐसा इस लिए होता है क्योंकि उनका नेटवर्क बडे़ बडे़ नामी में मशहूर है तो फिर बात ही क्या है "पापुलैरिटी इज इनफ" उनके लिए ये सिर्फ एक खेल है इससे ज्यादा कुछ नहीं.
मजदूरी के नाम पर भी इन मुफलिसों को ठेंगा देखने को मिलता है और सभी कुछ हड़प भी ले तो क्या हुआ इन रइसों के लिए कोर्ट कचहरी तो इनके बाप के पैसौ का बना हुआ प्रतीत होता हैं.


न जाने ऐसे कितने मुफलिस है जो हार मानकर अपने प्राणों की बलि दे दिए होंगे क्यों कि जग से पराजित हुए ये मुफलिस जब हर एक जगह से  नाकाम हो जाते हैं तभी आकाल का जन्म होता है और ये बद से बदतर हालात में चले जाते हैं , इसलिए कहा गया है कि "गरीब और गरीब होते जा रहे हैं" , "अमीर और अमीर" पर झेलना तो सिर्फ मुफलिसों को ही है क्योंकि सारे नियम कानून सिर्फ और सिर्फ इनके लिए ही बनाए गए हैं..

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

have any doutes. please let me