सिंगरामऊ(जौनपुर) 7 मार्च। वह जब भी स्टेज पर जाती है......सुर लगाती है.....लय के उतार-चढ़ाव के साथ ही उसके पिता अजय दुबे की धड़कनें भी बढ़ जाती हैं। यह कैफियत इसलिए नही होती कि उनकी पुत्री सुनिधि प्राची दुबे शास्रीय गायन में कमजोर है बल्कि उनको डर लगता है कि इतनी कम उम्र में ऐसी परिपक्वता देख उसको किसी की नजर न लग जाये।। गायकी को अपना मुकाम बना चुकी मेजर अमर बहादुर सरस्वती सिंह गर्ल्स सेन्ट्रल एकेडमी की कक्षा आठ की छात्रा सुनिधि प्राची दुबे जब-जब स्टेज पर आती है श्रोताओं को मन्त्र मुग्ध कर तालिया तो बटोरती ही है, साथ ही एवार्ड भी उसकी झोली में आ जाते हैं। पिता और गुरु दोनों ही होने के नाते अजय को भी एक भी सताता है, वे उसे थोड़ा और समय देना चाहते हैं, इसीलिये उसे ज्यादा कार्यक्रम नहीं करने देते। पूत के पाँव पालने में ही दिखने लगे थे, जब वः छोटी थी तो पापा की उंगलियां पकड़कर हारमोनियम सीखा और घर के माहौल में ही सा रे गा मा पा.... सीखा। धीरे धीरे गुंनगुनाने लगी, अब तो स्टेज शो, कम्पटीशन, भक्ति जागरण, में अपनी बेहतर गायकी के जरिये लोगो की वाहवाही लेती है। प्राची को शास्त्रीय संगीत की शिक्षा दिला रहे उसके पिता उसकी जन्मजात प्रतिभा को निखारने के लिये शास्त्रीय संगीत, भजन, देशभक्ति, लोकगीत, की प्रतियोगियता में पारंगत है। इसी का परिणाम रहा की उत्तर प्रदेश सरकार ने इस नन्ही बेटी को "नारी सम्मान" पुरस्कार से नवाजा तो उसका हौसला बढ़ना स्वाभाविक है। अपने माता पिता की इच्छा के अनुसार प्राची बड़ी होकर एक बेहतर गायक कलाकार बनना चाहती है। बकौल प्राची आत्मविस्वास बेहतर हो तो कोई भी लक्ष्य से डिगा नहीं सकता। कलाकार को कभी भी जमीर नहीं बेचना चाहिए। जमीर बेंच चुके इंसान को खुद से नजर मिलाना कठिन होता है। संगीत दुनिया की वह स्वादिष्ट मिठाई है, जिसे चखने के बाद कोई कही और नहीं भटकता। मुझे अपने पिता पर पूरा भरोसा है कि वो मुझे मेरी मंजिल तक पहुचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ेंगे। मुझे अपने पिता पर गर्व है क्योंकि वो खासकर मेरे लिए बहुत परिश्रम करते हैं।प्राची के आधा दर्जन भक्तिगीत के कैसेट बाजार में पहले ही लांच ही चुके हैं।

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