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मंगलवार, 5 मई 2020
**लॉक डाउन के बाद भारत - 'जान है तो जहान है' ** @वर्तमान संकट पर विशेषज्ञ व असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रवींद्र कुमार सिंह की बात@ सिंगरामऊ (जौनपुर) धरती पर मनुष्य जीवन का इतिहास अपने अभ्युदय काल से ही अकाल महामारी और भीषण प्राकृतिक आपदाओं के दंशों से भरा पड़ा है। इतिहास गवाह है विश्व में तमाम समृद्ध सभ्यताएं बनी और विनष्ट हो गई लेकिन मनुष्य की जीवन जीने की जिजीविषा कभी नहीं विनष्ट हुई। दुःख- सुख, बुरा वक्त अच्छा वक्त प्रकृति का अनुपम उपहार है; जहां मनुष्यता अपने को परिभाषित करती है - 'विषमता की पीड़ा से व्यक्त हो रहा स्पंदित विश्व महान यही सुख-दुख विकास का सत्य यही भूमा का मधुमय दान।' वर्तमान में भारत सहित पूरा विश्व कोरोनावायरस जैसी वैश्विक महामारी से जूझ रहा है और उसके विषदंत को तोड़ने के उपाय भी ढूंढ रहा है। ऐसे विषम समय में हमारे यशस्वी ऊर्जावान संवेदनशील मानवता प्रेमी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा उठाए गए त्वरित एवं प्रभावी कदमों से हम न केवल कोरोना जन्म महामारी से होने वाली हानि को कम कर पाए हैं बल्कि वैश्विक स्तर पर हमारे प्रयास को सराहा भी गया है। अब जब हम लाकडाउन 0.3 में प्रवेश कर गए हैं ऐसे में लाकडाउन के बाद भारत के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक सोच में भी परिवर्तन जरूर देखने को मिलेगा। भारत में लाकडाउन 0.1 की शुरुआत में संक्रमितों की संख्या 600 के करीब थी। प्रभावी लाकडाउन के कारण ही हम संक्रमितों की वृद्धि दर को नियंत्रित कर पाए हैं वह भी तब जब तबलीगी जमात के जाहिल लोगों ने पूरे देश में फैल; संख्या में अनपेक्षित बढ़ोतरी की। आज जब भारत में संक्रमितों की संख्या बयालीस हजार के पार पहुंच चुकी है और मौतों का आंकड़ा बारह हजार के पार है तो इसका श्रेय जमातियों को मिलना ही चाहिए। कोरोना वायरस अभी भी वैज्ञानिकों के लिए पहेली बना हुआ है; कारण कि यह वायरस नित अपना रूप बदल रहा है, लक्षण बदल रहा है। जब तक कोरोना के सारे लक्षण प्रकट नहीं हो जाते और वैज्ञानिक उसका अध्ययन नहीं कर लेते, तब तक इसका कोई मुकम्मल वैक्सीन आना संभव नहीं है और वैक्सीन आ भी गया तो वैश्विक स्तर पर उत्पादन, विपणन वितरण इतना आसान नहीं होगा। लाकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना कठिन चुनौती होगी बावजूद 'हम होंगे कामयाब एक दिन' के मंत्र के साथ धैर्य और साहस के साथ आगे बढ़ना होगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था अमेरिका - चीन व्यापार युद्ध, चीन की आक्रामक व्यावसायिक नीतियों एवं अन्य कारणों से पहले ही दबाव में थी तभी नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा नोटबंदी और जीएसटी संबंधी दीर्घकालिक लाभों को देखते हुए लिए गए साहसी निर्णयों से हमारी अर्थव्यवस्था नीचे की ओर अग्रसर हुई। हम अमेरिका चीन के आपसी हितों के टकराव का लाभ विश्व व्यापार में हिस्सेदारी बढ़ा प्राप्त कर सकते थे पर ऐसा हो नहीं सका शायद लोकतांत्रिक देशों में सुधार की प्रक्रिया ही धीमी होती है। लाकडाउन के बाद सबसे बुरा प्रभाव रोज कमाने खाने वाले गरीबों पर पड़ेगा। रोजगार कम होगें, बेरोजगारी बढ़ेगी, रोजगार का स्वरूप बदलेगा। भारतीय अर्थव्यवस्था में बहुत बड़ा योगदान उपभोक्ताओं का है। बेरोजगारी बढ़ने आय घटने का सीधा प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। हमारी अर्थव्यवस्था का सुखद पक्ष यह है कि देश की बहुत बड़ी आबादी आज भी कृषि आधारित है। भारत में किसान अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। सरकार ने खेती- किसानी को लाकडाउन से पूरी तरह मुक्त रखा है। अन्न के गोदाम भरे हैं, पैदावार अच्छी हुई है। लाकडाउन 0.3 में पूरे देश को तीन जोन (रेड, आॅ रेंज, ग्रीन) में बांटकर ऑरेंज और ग्रीन जोन में तमाम सावधानियों का पालन करते हुए छूट प्रदान कर दी गई है जो अर्थव्यवस्था के लिए शुभ कदम है। पहले से ही दबाव में रहे बैंकिंग सेक्टर को उबारने के लिए कई घोषणाएं की गई, रिजर्व बैंक ने उद्योगों को संभालने, कर्ज की व्यवस्था बढ़ाने और ऋण वापसी हेतु लचीले कदमों की घोषणाएं की। शातिर चीन इस महामारी में गिरती अर्थव्यवस्था का लाभ लेने के लिए मजबूत कंपनियों के अधिग्रहण की कुत्सित चाल चली पर सरकार के दृढ़ और त्वरित कदमों ने इसे निष्प्रभावी कर दिया। लाकडाउन के बाद सामाजिक जीवन संबंधों या यूं कहें हमारी जीवन शैली में व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा, बहुत कुछ दिख भी रहा है। देश की 130 करोड़ जनता ने इस लाकडाउन (0.1 - 0.2) का 'जान है तो जहान है' के लिए पूरी शिद्दत के साथ पालन किया कुछ अपवादों को छोड़कर। लाकडाउन 0.2 और अब लाकडाउन 0.3 (04 मई-17 मई) के बाद सब कुछ सामान्य नहीं होने जा रहा जब तक इसके निदान की कोई वैक्सीन सर्व सुलभ नहीं हो जाती। लाकडाउन के बाद हमारी जीवनशैली में जो परिवर्तन प्रत्यक्ष दिखेगा वह होगा-* लोगों के जीवन शैली में परिवर्तन आएगा। अब लोग स्वयं सार्वजनिक और भीड़ भाड़ वाले स्थलों पर जाने से परहेज करेंगे।* लाकडाउन में लोगों ने घर से ही आजीविका चलाना सीखना शुरू किया है। शिक्षकों ने घर से ही जूम जैसे एप्स के माध्यम से शिक्षा देने का हुनर सीख लिया या सीखना शुरू कर दिया। * विवाह और अन्य गैरजरूरी समारोहों से से लोग बचेंगे और खर्च भी कम करेंगे। * भोगवादी, भौतिकवादी दिखावे की संस्कृति से लोग बाहर निकलेंगे और समाज, परिवार, मित्र का मूल्य समझेंगे। * सक्रिय मस्तिक और उर्वर होगी। समस्या समाधान के अनेकानेक रास्ते निकलेंगे। साहित्य और विज्ञान के सागर से नए-नए मोती निकलेंगे। * प्रकृति के सकारात्मक परिवर्तनों को देखते हुए लोग आगे से प्रकृति के बारे में अपने भोगवादी सोच को बदलेंगे। * विज्ञान, स्वास्थ्य, चिकित्सा पर जोर दिया जाएगा। * शहरों के बरक्स गांव के प्रति लोगों के नजरिए में बदलाव आएगा। लाकडाउन से बाहर आने के बाद वैश्विक स्तर पर, हर स्तर पर परिवर्तन देखने को मिलेगा और उस परिवर्तन के केंद्र में होगा - 'जान है तो जहान है'। सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति और हम सबके सब्र, संयम, त्याग और राष्ट्रभक्ति से' 'कोरोना हारेगा, भारत जीतेगा'। जय हिंद जय भारत। डॉ रवीन्द्र कुमार सिंह असि प्रोफेसर & कार्यक्रम अधिकारी राष्ट्रीय सेवा योजना राजा हरपाल सिंह महाविद्यालय सिंगरामऊं जौनपुर
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