यस्मिन्निदं प्रोतमशेषमोतं ,
पटोयथा तन्तुवितानसंस्थः ।
त एष संसारतरुः पुराणः,
कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते ।।
(श्रीमद्भागवत ११- १३-२१)
जैसे तागों के ताने बाने मे वस्त्र ओत प्रोत रहता है वैसे ही यह सारा विश्व परमात्मा मे ही ओत प्रोत है । जैसे सूत के बिना वस्त्र का अस्तित्व नहीं है , किन्तु सूत बिना वस्त्र के भी रह सकता है , वैसे ही इसजगत् के न रहने पर भी परमात्मा रहता है अर्थात् यह जगत् परमात्म स्वरूप ही है । परमात्मा के बिना इसका कोई अस्तित्व नहीं । यह संसारवृक्ष अनादि और प्रवाहकाल से ही नित्य है। इसका स्वरूप ही है -- कर्म की परम्परा तथा इस वृक्ष के फल - मूल है--मोक्ष और भोग ।

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