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बुधवार, 8 अप्रैल 2020

आसक्त जीव दुःख ही भोगता रहता है .....धर्मराज तिवारी-व्यास जी

छिद्यमानं यमैरेतैः कृतनीडं वनस्पतिम्  ।
खगः स्वकेतमुत्सृज्य क्षेमं याति ह्यलम्पटः ।।
                   भा• ११|२०|१५
    यह शरीर एक वृक्ष है । इसमे घोंसवा बनाकर जीव रूप पंक्षी निवास करता है। इसे यमराज के दूत प्रतिक्षण काट रहे है  जैसे पंक्षी कटते हुए वृक्ष को छोडकर चला जाता है वैसे ही अनासक्त जीव भी इस शरीर को छोडकर मोक्ष का भागी वन जता है। परन्तु आसक्त जीव दुःख ही भोगता रहता है ।
       
           

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