विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र तथा संसदीय मान मर्यादाओं और श्रेष्ठ परम्पराओं के उच्च मानदंड स्थापित करने वाले देश भारत मे पिछले कुछ वर्षों से लोकतान्त्रिक भावनाओं पर कुठारा घात किया जा रहा है , संवैधानिक मूल्य ,आदर्श और मर्यादाए सिसकती नजर आ रही है, संसदीय शिष्टाचार के प्रतिमान दिनों ब दिन घटते जा रहे है। सिद्धांत विहीन राजनीति का व्यापक विस्तार हुआ है । विश्वसनीयता और उत्तरदायित्वपूर्ण मर्यादाओं का भयावह क्षरण हुआ है। वास्तविकता के धरातल पर भारतीय लोकतन्त्र वैचारिक व्यवहारिक दोनों रूपों के चुनौतियों का सामना कर रहा है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र के त्यौहार का समापन हुआ, इसी सबसे बड़े लोकतन्त्र मे एक असहज करने वाली घुटन महसूस हो रही है, संसदीय लोकतन्त्र की अपनी गरिमा होती है और किसी को भी इस गरिमा के साथ छेडछाड़ या ठेस पहुचाने की इजाजत नही दी जा सकती है । यह बात अलग है की लोकतन्त्र के मंदिर मे पहुचने वाले सदस्यों की राजनीति की दिशा कुछ भी हो परंतु संसद की गरिमा बनाए रखना राजनीतिक दलों और सांसदों का सामूहिक उत्तरदायित्व बनाता है । जिस देश का संविधान देश को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने की संकल्पना करता है ,उसी राष्ट्र की संसद मे सांसदों के शपथ ग्रहण समारोह मे जिस तरह से धार्मिक नारे लगे वह पूरे देश के लिए गंभीर चिंता का विषय है संसद को अब क्या धार्मिक अखाड़ा बना देंगे । सवाल यह है कि संसद ओवैसी तथा तृणमूल के निर्वाचित संसद सपथ लेने गए तो भाजपा के कुछ सांसदों ने जय श्री राम का नारा क्यों लगाया ? क्या यह सोची समझी चाल थी ?क्या अब हमे संसद मे अब ऐसे ही दृश्य देखने को मिलेंगे ? इससे भी गंभीर चिंता का विषय यह है कि इस घटना के बाद किसी ने माफी नही मांगी न ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने वालों ने और न ही ‘अल्लाह हू अकबर’ कहने वालों ने । शायद भारतीय लोकतन्त्र को धर्मनिरपेक्ष बनाए रखने की चाहत किसी मे नही है । अगर ऐसा है तो भारतीय लोकतन्त्र खतरनाक दिशा मे बढ़ता जाएगा। धर्म आधारित देशों कि हालत हम देख रहे है देश धर्म से नही बल्कि सकारात्मक राजनीतिक वैज्ञानिक सोच से आगे बढ़ता है । सबक़ों को यह ध्यान रखना चाहिए कि संसद इस देश के आम आदमी ,किसान ,मजदूर , बेरोजगारो कि उम्मीदों का सबसे बड़ा ठिकाना है उसे उम्मीद होती है उसके चुने हुये प्रतिनिधि संसद मे जाकर उसकी जिंदगी को खुशहाल बनाने के लिए काम करेंगे । जिस देश मे 55-57 फीसदी लोग खेती पर निर्भर है उनके लिए क्या ठोस कदम हो ,तथा उनकी उपज का सही दाम कैसे मिलने लगे ? इस पर बहस हो , वर्तमान समय मे देश बेरोजगारी के सबसे बुरे संकट से गुजर रहा है आकड़ों की माने तो बीते 45 सालों मे इतनी बड़ी संकट आया है बेरोजगारी कि समस्या को कैसे दूर किया जा सकता है ? पर बहस होनी चाहिए । सत्ता पक्ष की नीतियों मे क्या खामी है तथा इसकों कैसे दूर किया जाय ताकि सत्ता पक्ष निरंकुश न हो संसद वास्तव मे देश को दिशा देने के लिए है मगर दुर्भाग्य है संसद मे ‘जय श्री राम’और ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगाए जा रहे है जिन सांसदों को अपने क्षेत्र के समस्याओं के प्रतिनिधित्व के लिए भेजा गया है वे अपने धर्म का प्रतिनिधित्व कर रहे है। यह कहने मे कोई गुरेज नही है कि हालत ठीक नही है सभी दलों को सोचना होगा कि संसद कि गरिमा को कैसे बहाल किया जाए धर्मनिरपेक्षता हमारी सबसे बड़ी ताकत है इसे बनाए रखना होगा , यह देश को गलत राह पर ले जाने कि कोशिश है जिसे हर हाल मे रोका जाना चाहिए , अब देश उस मोड़ पर आ पहुचा है जब सचमुच नए सिरे से इन सवालों का जबाब देने कि कोशिश की जानी चाहिए जो आसान नही है ।
गणेश शुक्ल (शोध छात्र )
महात्मा गांधी अंतराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय वर्धा महाराष्ट्र
tikhiawaz24.in
मंगलवार, 25 जून 2019
संसद है या धार्मिक अखाड़ा
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