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शनिवार, 26 सितंबर 2020

सारा विश्व परमात्मा मे ही ओत प्रोत है । जैसे सूत के बिना वस्त्र का अस्तित्व नहीं....व्यास - धर्मराज तिवारी


 यस्मिन्निदं  प्रोतमशेषमोतं , 

    पटोयथा तन्तुवितानसंस्थः ।

त  एष  संसारतरुः  पुराणः,

    कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते ।।

       (श्रीमद्भागवत ११- १३-२१)

जैसे तागों के ताने बाने मे वस्त्र ओत प्रोत रहता है  वैसे ही यह सारा विश्व  परमात्मा मे ही ओत प्रोत है । जैसे सूत के बिना वस्त्र का अस्तित्व नहीं है , किन्तु सूत बिना वस्त्र के भी रह सकता  है , वैसे ही इसजगत् के न रहने पर भी परमात्मा रहता है      अर्थात् यह जगत् परमात्म स्वरूप ही है । परमात्मा के बिना इसका कोई अस्तित्व नहीं । यह संसारवृक्ष अनादि और प्रवाहकाल से ही नित्य है। इसका स्वरूप ही है -- कर्म की परम्परा तथा इस वृक्ष के फल - मूल है--मोक्ष और भोग ।

       

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