जौनपुर। किसी जमाने में पूर्वांचल की प्रमुख चीनी मिलो में शुमार रत्ना शुगर मिल शाहगंज को तत्कालीन बीएसपी सरकार ने अपने चहेते पोंटी चड्ढा को कौड़ियों के भाव बेच दी थी। यह मिल बिकने के बाद जौनपुर और सीमा से आजमगढ़ , अम्बेडकर नगर और सुल्तानपुर के किसानो ने गन्ने की खेती बंद कर दिया। जिसके कारण अन्नदाताओ की माली हालत पतली हो गई। योगी द्वारा बेचीं गई चीनी मिलो की जाँच करने के फरमान से गन्ना किसानो में एक नई आस जग गई है। 1932 में स्थापित रत्ना शूगर मिल 9.75 करोड़ रुपये में ही बेच दी गई थी। इस मिल की उस वक्त कीमत 54 करोड़ होने के बावजूद भी अधिकारियों ने खेल किया। 84 साल बाद भी जिले के गन्ना किसानों को भाजपा सरकार से एक बार फिर इस चीनी मिल को चलाने की आस जगी है। वाराणसी के चार व्यापारी बंधुओं द्वारा वर्ष 1932 में स्थापित रत्ना शूगर मिल को मालिकों द्वारा घाटा दिखाकर बंद किया गया था। 1989 में प्रदेश सरकार ने मिल का अधिग्रहण करके रत्ना शुगर मिल से उत्तर प्रदेश राज्य चीनी मिल निगम लिमिटेड कर इसे शुरू किया। लेकिन 57 साल पुरानी हो चुकी मिल की मशीनों का नवीनीकरण नही कराया। जिसके चलते सरकारें भी मिल संचालन में कामयाब नही हो सकीं और 2006 में मिल बंद हुई तो 80 स्थाई, 450 अस्थाई व 177 सीजनल कर्मचारियों के जीवन यापन का पहिया भी रुक गया। मिल बंद होने से जौनपुर के अलावा आजमगढ़, सुल्तानपुर, अम्बेडकर नगर में किसानों ने गन्ने की खेती बंद कर दी। 30 मार्च 2011 को चीनी मिल महज नौ करोड़ 75 लाख रुपए में बेच दी गई। आज भी मिल पर खरीददारों का सुरक्षा के लिए जवानों का पहरा है। वहीं दूसरी ओर मजदूर संघ, समाजसेवी, राजनैतिक दलों के लोग मिल को बचाने की आस में उच्च न्यायालय की शरण में हैं।
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