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बुधवार, 26 अप्रैल 2017

मनरेगा के तहत प्रत्येक ग्राम पंचायत में खोदे गए पोखरे को गरमी के दिनों में नहर या नलकूप से पानी भरे जाने का फरमान















  डॉ- ए के यादव                                                      अंधाधुंध जल दोहन के कारण तेजी से खिसकते भू-गर्भ जलस्तर पर अंकुश लगाने को मनरेगा के तहत खोदे गये जलाशय बस औपचारिकता तक सिमट कर रह गए हैं। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत खोदाई एवं घाट निर्माण के बाद निर्मित आदर्श जलाशयों में जल संरक्षण हेतु अनिवार्य बोरिंग के प्रावधान का अनुपालन न होने से गर्मी आते ही ऐसे पोखरे सूखने लगते हैं। उधर गर्मी के दिनों में पोखरों में पानी भरे जाने के शासनादेश का भी अभी तक अनुपालन नहीं शुरू हो सका है। सूखे जलाशय मुंह चिढ़ा रहे हैं।
चारों तरफ घाट और किनारे पर लहलहाते हरे पेड़-पौधे। बीचोबीच गहरा जलाशय है पर सूखा है। यह दृश्य गर्मी के दिनों में समूची व्यवस्था पर एक सवाल बन जाता है। हाल यह कि यदि किसी जलाशय में पानी है तो या वह निजी स्वामित्व में है या फिर मत्स्य पालन किया जाता है। सार्वजनिक जलाशय तो सूखे ही रहते हैं। तेजी से कट रहे वृक्ष, पट रहे जलाशय, सिकुड़ रहे तालों एवं बढ़ रही आबादी के बीच प्राकृतिक जल का संरक्षण नहीं हो पा रहा है।
पर्यावरण पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभाव एवं प्रदूषण ने औसत तापमान में वृद्धि कर दिया है। इन कारणों के चलते भूजल स्तर तेजी से प्रतिवर्ष नीचे खिसकता जा रहा है। हाल यह कि गरमी आते ही हैंडपंप पानी छोड़ देते हैं। कुआं का प्रयोग प्रचलन से बाहर हो गया तो जल संरक्षण का यह आम स्त्रोत अब स्वयं अंतिम सांस ले रहा है। बात करें केंद्र से ले कर प्रदेश सरकार और स्थानीय प्रशासन की तो जल संरक्षण हेतु बेहद स्पष्ट प्रावधान वर्णित है।
जलाशयों में विशेषकर आदर्श जलाशयों की खुदाई एवं सुंदरीकरण के साथ ही बीचोबीच बोरिंग अनिवार्य है। गरमी के दिनों में इनमें नहर, शासकीय नलकूप या फिर निजी नलकूप से जल भरे जाने का स्पष्ट निर्देश दिया गया है।
जल संरक्षण के साथ ही श्रमिकों को गांव में रोजगार उपलब्ध कराए जाने हेतु केंद्र सरकार द्वारा संचालित महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत पोखरे की खोदाई कर इनलेट व आउटलेट के साथ ही बीचोबीच बोरिंग अनिवार्य है। इस बोरिंग की पाइप का व्यास जलाशय के क्षेत्रफल के अनुसार तय किया जाता है। पाइप पर फिल्टर लगाना भी अनिवार्य है। इसके पीछे मंशा यह कि बरसात का पानी इसके फिल्टर से छन कर पाइप के सहारे नीचे जमीन में जाए। ऐसा होने से गरमी के दिनों में इस जलाशय का पानी आसानी से नहीं सूखेगा। विडंबना यह कि बदलापुर तहसील के चंद गांवों में खोदे गए जलाशयों को अपवाद मान लें तो इस अहम प्रावधान का अनुपालन ही नहीं हो रहा है। इस बाबत अधिकारी भी मौन हैं तो कोई खुलकर बोलता नहीं।
यह जांच का विषय है कि इन पोखरों की खोदाई के बजट में बोरिंग का व्यय प्रदर्शित है या नहीं। यदि ऐसा है तो तय है कि एक बहुत बड़े घोटाले की संभावना भी है। मनरेगा के तहत प्रत्येक ग्राम पंचायत में खोदे गए पोखरे को गरमी के दिनों में नहर या नलकूप से पानी भरे जाने का फरमान है। यह भी लगभग बेमानी साबित हो रहा है। निजी नलकूप से पानी भरे जाने पर ग्राम पंचायत द्वारा भुगतान की व्यवस्था भी है।
उपजिलाधिकारी बदलापुर श्री शिवशरणप्पा ने गरमी के दिन में प्यासे पशु पक्षियों ही नहीं वरन जलस्तर बनाए रखने को जलाशयों में पानी भरा जाना जरूरी तो बताया, परन्तु उन्होने यह भी कहा कि इस संबंध में अभी कोई शासनादेश नहीं आया है फिर भी मैं कृषि विभाग के अधिकारियों से बात किया हूँ और मत्स्य पालन वाले तालाबों में पानी भरवाने की बात चल रही है।

फोटो - -

जनपद जौनपुर के बदलापुर तहसील के अंतर्गत सिंगरामऊं सर्किल के बर्रैया गॉव का आदर्श तालाब।

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