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बुधवार, 24 अगस्त 2016

रामसेवक विश्वकर्मा

सुलतानपुर :
 यूं तो अस्पताल मरीजों के इलाज के लिए ही होते हैं, लेकिन आम तौर पर हकीकत इससे जुदा होती है। इंसानियत यहां कम ही देखने को मिलती है। ऐसे में शहर के जिला अस्पताल में कुछ लोग नजीर बन गए हैं। दस दिन पहले उत्तराखंड से आए एक लावारिस वृद्ध की हालत इस कदर बदतर हो गई थी कि वह मौत के मुंह में पहुंच गया, लेकिन इस अंजान की सेवा-सुश्रुषा कर चिकित्सा कर्मी एक बार फिर धरती के भगवान के रूप में दिखने लगे। उनकी मानवता और सेवा भाव समाज के लिए प्रेरणास्त्रोत है।

हरिद्वार (उत्तराखंड) के ज्वालापुर निवासी पप्पू (62) कुछ दिनों पहले सुलतानपुर शहर आया। वो लोगों के लिए अंजान था। शहर के समीप सैदपुर चीनी मिल के पास एक मंदिर में रहने लगा। उसके सिर में बीते दिनों चोट लग गई। समुचित इलाज के अभाव में घाव बढ़ता ही गया। उसमें सड़न पैदा हो गई। इलाकाई लोगों को उसकी हालत पर तरस आया तो वे नौ अगस्त को उसे जिला अस्पताल की इमरजेंसी में लेकर आए। डॉ.मनीष यादव ने जांच पड़ताल के बाद पप्पू को सेप्टिक वार्ड में भर्ती कर लिया।

उसकी हालत इतनी खराब थी कि घाव से उठ रही बदबू के कारण बगल खड़ा होना मुश्किल था। बावजूद इसके जिला अस्पताल के सर्जन डॉ.रमेश गौतम व हाउस जॉब कर रहे अनिल दूबे, केसरी ¨सह व राजेश कुमार आदि ने मरीज की जटा काटकर घाव साफ किया तो सैकड़ों कीड़े निकले। लगातार मरहम पट्टी व सेवा का नतीजा रहा कि अब घाव करीब साठ फीसद भर चुका है। लावारिस पप्पू को अस्पताल कर्मी बाबा कहकर बुलाते हैं। बकौल पप्पू अस्पताल के डॉक्टर व कर्मी उसके लिए भगवान स्वरूप हैं। वह कहता है कि ये लोग न होते तो उसकी ¨जदगी न बच पाती। चिकित्साकर्मियों के इस सेवा भाव की सराहना खुलेदिल से लोग कर रहे हैं।

पान की दुकान लगाने वाले रामबोध उठा रहे खर्च

जिला अस्पताल गेट के पास सड़क किनारे पान की गुमटी लगाकर परिवार का भरण पोषण करने वाले रामबोध लावारिस पप्पू के लिए किसी मसीहा से कम नहीं हैं। बीते सात दिनों से वे मरीज के खाने-पीने से लेकर इलाज तक का पूरा खर्च अकेले उठा रहे हैं। सुबह-दोपहर-शाम नियमित रूप से पप्पू के भोजन व दवा पानी का इंतजाम करते हैं।

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